तहलका न्यूज,बीकानेर। धुलंडी के दिन से चल रहा गणगौर पूजन उत्सव सम्पन्न हो गया। पूजन उत्सव के आखिरी चरण में गणगौर प्रतिमाओं के खोळा भरने,पानी पिलाने और भोग अर्पित करने की रस्म हुई। कुंआरी कन्याओं ने गाजे बाजे के साथ मां गवरजा को विदाई दी। गणगौर पर शाही सवारी निकली। राज परिवार की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को निभाते हुए जूनागढ़ से गवर राजशाही वैभव के साथ बाहर निकली और चौतीना कुआं पर पानी पीने की रस्म अदा की। जूनागढ़ से गवर निकली तो बैंड बाजे की धुन शुरू हो गई। यहां से पूरी रीति नीति के साथ गवर को चौतीना कुआं तक ले जाया गया। इस दौरान राजपरिवार से जुड़ी महिलाओं ने गंवर को अपने सिर पर रखा और चौतीना कुआं तक पहुंचा। गवर के साथ बड़ी संख्या में लोग चौतीना कुआ पहुंचे।इस दौरान जिला प्रशासन की ओर से पुख्ता व्यवस्था की गई। पुलिस और यातायात पुलिस ने गवर को रास्ता दिया।

मेले भरे,लगी अस्थाई दुकानें

इधर जस्सूसर गेट के अंदर व नया कुंआ क्षेत्र में मेले भरे। जहां पूजन करने वाली कन्याओं ने पालसिए भोलावन की रस्म अदा की। मेला स्थलों पर खाने,पीने की अस्थाई दुकानें लगी तो अनेक प्रकार के झूले भी लगे। वहीं घरों में महिलाओं ने गवर प्रतिमाओं को धोती ओढाई और सुहाग सामग्री अर्पित कर घर-परिवार की खुशहाली,सुख-समृद्धि और मंगल कामनाएं की।गणगौर को विदाई देने के दौरान महिलाओं ने गणगौर प्रतिमाओं के श्रीचरणों में श्रीफल और नकद राशि भेंट कर सभी के लिए मंगल कामनाएं की। गणगौर प्रतिमाओं के समक्ष महिलाओं ने गणगौर के पारम्परिक गीतों का गायन किया और प्रतिमाओं के समक्ष नृत्य प्रस्तुत किए। कई स्थानों पर विविध व्यंजन गणगौर के समक्ष अर्पित किए गए। मंगलवार को भी गणगौर मेला भरेगा। जहां गणगौर को विदा किया जाएगा। गौरतलब रहे कि होली के अगले दिन से ही बीकानेर में गणगौर की रंगत शुरू हो जाती है। कुंवारी लड़कियां अपने घर या आसपास के घरों की छत पर गणगौर मांडती है। समय के साथ इस कला को भी विकसित होने का अवसर मिला है। सोलह दिन तक गणगौर की पूजा करने के बाद गणगौर मेले के दिन अपनी अपनी गंवर अपने ईसर के साथ ससुराल जाती है।इस परपंरा का निवर्हन सोमवार को भी बड़ी धूमधाम से हुआ। लोग घर की एक कन्या की तरह गवर की सेवा करते हैं।

ईसर- गणगौर के बिंदोरे निकाले
गणगौर पूजन के तहत महिलाओं ने यहां घरों में ईसर- गणगौर के बिंदोरे निकाले है।इस अवसर पर विधिवत पूजा अर्चना कर पारंपरिक मंगल गीत गाए । पूजन करने वाली महिलाओं व कन्याओं ने बताया कि होलिका दहन की राख से बनी पिंडलियों की पूजा करने के बाद आठवें दिन एकत्र होकर कन्याओं ने मिट्टी से ईसर-गणगौर सहित कान्हू जी,भाईया,मालन,ढोलन,सोदरा, आदि की प्रतिमाएं तैयार की। पूजन करने वाली महिलाएं प्रतिदिन शाम के समय प्रतिमाओं को बड़े थाल में सजा कर गीत गाती हुई घरों में जाकर बिंदोरा निकालती है।यह रस्म पारंपरिक तौर पर शादी के समय दूल्हा-दुल्हन का बिंदौरा निकालने से जुड़ी हुई बताते है। इसे लेकर उत्साहित महिलाओं ने ‘ईसरलाल बीरा चुनरी रंगाई रे,’ईसर प्यारा जैपुर जाइजो जी,आंवता लाईजो तारां री चुनरी सहित विभिन्न प्रचलित लोक गीत गाए और बिंदोरे के लिये सूरसागर स्थित पार्क में गई।

यह है परम्परा
महिलाओं ने बताया कि परंपरा अनुसार सबसे पहले ईसर गणगौर की आरती की जाती है। उसके बाद भोग लगाकर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस दौरान बिंदौरा निकालने वाले परिवार की ओर से साथ आई महिलाओं को जलपान करवा कर आवभगत की जाती है। पूजन कार्यक्रम के बाद खुशियां मनाती महिलाएं थाली में सजी प्रतिमाओं को पूजन स्थल पर वापस ले जाती है । सुबह पूजन और शाम को रोजाना अन्य घरों मे बिंदोरा निकालने का सिलसिला चैत्र मास के शुक्लपक्ष की दूज तक जारी रहता है। अंतिम दिन सवारी निकालकर नगर परिक्रमा के बाद गणगौर का विसर्जन होता है।