





तहलका न्यूज,बीकानेर।पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव से पहले दो बच्चों की बाध्यता समाप्त होने का असर राजनीतिक दलों के भीतर दिखाई देने लगा है।भाजपा और कांग्रेस नेताओं के अनुसार इस फैसले के बाद चुनाव लडऩे के इच्छुक दावेदारों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।इनमें 20 से 25 फीसदी ऐसे नेता और कार्यकर्ता शामिल है,जो दो से अधिक बच्चे होने के कारण पहले चुनावी दौड़ से बाहर हो गए थे।अब उनके लिए चुनावी रास्ता खुलने से टिकट की दौड़ और लंबी होने के संकेत पार्टियों के कार्यक्रमों और दफ्तरों में भीड़ देखकर मिलने लगे है।दो बच्चों की शर्त का प्रभाव सबसे ज्यादा पंचायत चुनावों पर पड़ता था। ऐसे में नियम हटने का सीधा असर गांवों की राजनीति पर पड़ा है।
भाजपा-कांग्रेस के लिए बढ़ी टिकट की चुनौती
राजनीतिक दलों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण की मानी जा रही है।पहले जहां दावेदारों की संख्या सीमित थी,वहीं अब पुराने और नए दोनों तरह के चेहरे टिकट की दौड़ में हैं। स्थानीय संगठन से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक को सामाजिक समीकरण,जीत की संभावना और संगठनात्मक सक्रियता के आधार पर चयन करना होगा। कई सीटों पर टिकट को लेकर अंदरूनी प्रतिस्पर्धा बढऩे की संभावना है। खास बात यह है कि हर समुदाय में ज्यादा दावेदार बढऩा बताया जा रहा है।
‘युवा बनाम अनुभव’ का मुकाबला दिख सकता
हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों ने जेन-जी और युवा मतदाताओं पर विशेष फोकस किया है।संगठन से लेकर चुनावी रणनीति तक युवाओं को आगे लाने की कोशिश हो रही है,लेकिन दो बच्चों की बाध्यता हटने के बाद अब अनुभवी और उम्रदराज चेहरे भी पूरी ताकत से मैदान में उतर सकेंगे। इससे कई क्षेत्रों में मुकाबला ‘युवा बनाम अनुभव’ का रूप ले सकता है।
लौट सकते हैं पुराने खिलाड़ी
ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे कई पूर्व जनप्रतिनिधि और प्रभावशाली नेता हैं,जो केवल पात्रता नियम के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे।अब उनके लौटने से स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।कई जगह परिवारों और गुटों की पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी फिर सक्रिय होने की संभावना जताई जा रही है।ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के लिए भी मुश्किल बढ़ गई है कि अब दावेदारों को लेकर खींचतान बढ़ सकती है।
दिग्गज उतर सकते है मैदान में
बीकानेर नगर निगम में अनारक्षित मेयर की आरक्षण लॉटरी खुलने के बाद अब मेयर बनने के लिए दोनों पार्टियों के दिग्गज नेता मैदान में उतर सकते हैं।पार्टियों में बड़े पदों या निकाय में पदाधिकारी रहे नेताओं को मौका मिल सकता है।ऐसे में दोनों पार्टियों के नेताओं को पार्षद की पहली सीढ़ी पार करनी होगी। हालांकि ये इतना भी आसान नहीं है,क्योंकि वार्डों की लॉटरी मेयर के दावेदारों के चेहरे तय करेगी।
वार्डों की लॉटरी तय करेगी किसकी किस्मत खुलेगी
मेयर पद की दौड़ के लिए सपना देख रहे दिग्गज नेताओं को अब वार्डों की लॉटरी का इंतजार है।लॉटरी में वार्ड रिजर्व होने के बाद स्थिति और भी साफ हो जाएगी कि दोनों पार्टियों के कौनसे बड़े नेता दोबारा मैदान में उतरने वाले हैं।
पिछले कई वर्षों से सक्रिय है पूर्व पार्षद
पंचायत चुनाव की महापौर लॉटरी सामान्य वर्ग की निकलने के बाद अब नये व पुराने पार्षद फिर से सक्रिय हो गये है।बताया जा रहा है कि कुछ निर्दलिय रहे पार्षद अपना एक गुट बनाकर प्रत्याशी उतारने की रणनीति पर विचार कर रहे है।सूत्रों के अनुसार पूर्व पार्षद मनोज विश्नोई इसकी अगुवाई कर रहे है।जिन्होनें अपने प्रभावशाली वार्डों में प्रत्याशियों को उतारने पर मंथन कर रहे है। जानकारी मिली है कि इसको लेकर एक गुप्त बैठक भी हो चुकी है।जिसके बाद राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गये है और वे पुराने पार्षदों के रणनीति पर निगाहें टिकाएं हुए है।अब देखना यह है कि आखिर पूर्व पार्षद मनोज विश्नोई के नेतृत्व में उम्मीदवार चुनाव मैदान में प्रमुख राजनीतिक दलों को चुनौती देंगे।हालात यह है कि मनोज विश्नोई सहित कई पूर्व पार्षद पिछले लंबे समय से शहर व आमजन की समस्याओं को उठाने सक्रियता दिखा रहे है।जिसके कारण आमजन का विश्वास भी इनके उपर है और यही बड़ा कारण है कि पूर्व पार्षद तीसरे मोर्च के रूप में ताल ठोकते नजर आयेंगे।इतना ही नहीं टिकट वितरण के बाद उभरे अंसतोष के बाद भी कई युवा नेता भी इनके साथ आने की संभावना है।
