जयनारायण बिस्सा
तहलका न्यूज,बीकानेर। एक ओर तो केन्द्र व राज्य सरकार पारदर्शिता से कामकाज का दावा करती है। लेकिन सरकारी विभाग किस तरह कामकाज करते है और सरकार को ही चूना लगाते है। इसका जीता जागता उदाहरण श्रम आयुक्त के नोटिस से देखने को मिला है। जिसमें संभाग की सबसे बड़ी अस्पताल पीबीएम व यहां श्रमिकों की खून चूसने वाली ठेका कंपनियां बिना पंजीकरण के श्रम कानूनों का मखौल उड़ा रही है। मजे की बात तो यह है कि बिना पंजीकरण के किसी भी कार्यरत संविदाकर्मी के साथ अनहोनी होने पर न तो पीबीएम की कोई जिम्मेदारी तय होती और न ही ठेका कंपनी की। यह हालात केवल पीबीएम के नहीं है। बल्कि लगभग सरकारी कार्यालय,विश्वविद्यालयों के है,जहां संविदा पर कार्मिक कार्यरत है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार श्रम विभाग में केवल तीन ठेका फर्मों का ही पंजीयन हुआ है। जबकि 170 ठेका कंपनियां व सरकारी अनुभाग ने अपना पंजीकरण श्रम विभाग में नहीं करवा रखा है।श्रम विभाग के नियमों पर नजर डाले तो प्रत्येक ठेका कंपनी को संबंधित जिले में श्रम विभाग में पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। अगर बिना पंजीकरण के वह किसी विभाग में ठेका कार्य करता है तो उसके उपर जुर्माना व मालिक को जेल का प्रावधान तक है। मंजर यह है कि जिले में सालों से बिना पंजीकरण ठेका कंपनियां संविदा पर नौकरी रखने के ठेके लेकर करोड़ों का चूना सरकारों को लगाती आ रही है।

पीबीएम व पन्नाधाय सिक्योरिटी एजेन्सी को मिला नोटिस
संभागीय संयुक्त श्रम आयुक्त आसकरण मालवीय ने पीबीएम अधीक्षक व उदयपुर की मैसर्स पन्नाधाय सिक्योरिटी एजेन्सी को एक नोटिस जारी कर ठेका श्रमिक नियोजित किये जाने के बावजूद अधिनियम के तहत ठेकेदार का पंजीकरण नहीं कराये जाने एवं अन्य प्रावधानों की पालना नहीं किये जाने का उल्लेख करते हुए तीन दिन में संतोषजनक जबाब देने के आदेश दिए है। ऐसा नहीं करने पर कानूनन कार्रवाई की बात कही है।पीबीएम में भी ऐसी कई ठेका कंपनियां शामिल है।

यह है कानून
ठेका श्रम (विनियमन और उन्मूलन)अधिनियम,1970 के तहत ठेकेदारों और संविदा श्रमिकों का उपयोग करने वाले प्रतिष्ठानों के लिए श्रम लाइसेंस पंजीकरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। अधिनियम के अनुसार,केन्द्र सरकार से संबंधित कार्यालयों में 20 और राज्य सरकार के अधीनस्थ कार्यालयों में 50 या अधिक श्रमिकों वाले किसी भी ठेकेदार को परिचालन शुरू करने से पहले संबंधित श्रम विभाग से श्रम लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक है। कोई भी ठेकेदार,वैध लाइसेंस प्राप्त किये बिना,ठेका श्रमिक नियोजित नहीं कर सकता है। पंजीयन/लाइसेंस के अभाव में ठेका श्रमिक नियोजन दंडनीय होगा। विभिन्न शासकीय विभागों,निगम-मंडलों एवं विशेषत: निर्माण कार्य संपादित करने वाली संस्थायें किसी भी एजेंसी/ठेकेदार को कार्यादेश यानि वर्क आर्डर जारी करते समय सुनिश्चित करें कि संबंधित ठेकेदार के पास वैध एवं प्रभावी लाइसेंस उपलब्ध हो। प्रत्येक जारी वर्क आर्डर की प्रति संबंधित क्षेत्रीय श्रम कार्यालय को उपलब्ध कराई जाये जिससे आवश्यक मार्गदर्शन एवं समन्वय किया जा सके। श्रमिकों के हितों की प्रभावी सुरक्षा के लिये इन विधिक प्रावधानों का सुचारु रुप से पालन किया जाये।

श्रम लाइसेंस पंजीकरण के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य
ठेकेदारों के लिए आवश्यक संख्या में संविदा श्रमिकों का होना अनिवार्य है।
वेतन,सुरक्षा और कल्याण संबंधी नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करता है।
उद्योगों, कारखानों, निर्माण स्थलों और सेवा क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के लिए लागू।
संबंधित राज्य श्रम विभाग द्वारा जारी किया गया
नवीकरणीय और आवधिक अनुपालन के अधीन

शिकायतों पर गौर नहीं,बंधुआ जैसे हालात
आउटसोर्स कंपनियों की शिकायतें पहुंचने के बावजूद अधिकारी इससे पल्ला झाडऩे में जुट जाते हैं। यही वजह है कि आउटसोर्स व्यवस्था की आड़ में श्रम कानूनों का उल्लंघन जारी है। आउटसोर्स,संविदा और गेस्ट फैकल्टी के रूप में काम कर रहे कर्मचारियों को न तो साप्ताहिक अवकाश मिलता है। जब कभी साप्ताहिक अवकाश के नाम पर कर्मचारी छुट्टी पर रहता है तो उसका वेतन काट लिया जाता है।कर्मचारियों को प्रसूति,चिकित्सा अवकाश जैसी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। यही नहीं,सरकार के विभागों से कर्मचारियों के नाम पर जिस वेतन पर कंपनियां अनुबंध करती है,उसमें भी कटौती और कमीशनखोरी हो रही है। आउटसोर्स व्यवस्था हर जगह कर्मचारियों के हितों पर कुठाराघात कर रही है।

रोजगार की आड़ में कमाई का झाड़
श्रम कानून के मुताबिक कर्मचारियों को तय मापदंडों से मासिक वेतन का भुगतान होना चाहिए। लेकिन,अधिकारियों की मिलीभगत से कंपनियां कर्मचारियों को कम वेतन दे रही हैं। स्थिति ये है कि बिजली कंपनियां,अस्पतालों में आउटसोर्स कर्मचारियों से सुरक्षा,सफाई और मेंटेने ंस का काम कराने के बदले में पांच,सात या अधिकतम 10 हजार रुपए ही वेतन दिया जा रहा है। जबकि सरकार से 12 से 20 हजार रुपए मासिक का अनुबंध होता है। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या को कंपनियों ने कमाई का जरिया बना लिया है।

आउटसोर्स पर टिकी विभागों की व्यवस्था
ग्राम पंचायतों के भवन की सुरक्षा में तैनात पंचायत चौकीदार, चपरासी, सफाई कर्मी एवं पम्प ऑपरेटर पांच हजार से कम मासिक वेतन में क ाम कर रहे हैं। वहीं सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन पकाने वाली महिलाकर्मियों को भी चार से पांच हजार रुपए ही दिए जा रहे हैं। जबकि, सरकार महज 3-4 हजार रूपए में काम कराया जा रहा है। नगरीय निकायों की पूरी व्यवस्था आउटसोर्स या संविदा पर निर्भर है। सफाई क र्मचारी,कम्प्युटर ऑपरेटर से लेकर स्वच्छता अभियान जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का जिम्मा भी अस्थायीकर्मी संभाल रहे हैं। पूरे प्रदेश में बिजली कंपनियों के पास 20 फीसदी ही लाइनमैन या सब स्टेशन ऑपरेटर स्थायी है बाकी पूरी बिजली सप्लाई आउटसोर्स कर्मचारियों के जिम्मे है।
क्या कहते है जिम्मेदार
पीबीएम अधीक्षक व सिक्योरिटी कंपनी को धारा 7,9 सपठित 23 के तहत नोटिस देकर तीन में पंजीकरण करवाने व जबाब देने को कहा गया है। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो ठेका निरस्त करने के साथ साथ जुर्माना व जेल का प्रावधान है।
आसकरण मालवीय
संभागीय संयुक्त श्रम आयुक्त

श्रमिकों का किया जा रहा है शोषण
कोई भी ठेका कंपनी बिना पंजीकरण अगर श्रमिकों से काम करवा रही है। तो श्रम कानूनों की अवहेलना हो रही है। पंजीकरण नहीं करवाने के पीछे ठेका कंपनियों का मूल उद्देश्य श्रमिकों का शोषण करना है। ऐसा नहीं होने देंगे। श्रमिकों के हक के लिये आवाज बुलंद करेंगे। श्रम आयुक्त से मुलाकात कर मामले से अवगत करवाया है।
गौरीशंकर व्यास,श्रमिक नेता