तहलका न्यूज,बीकानेर।चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में फर्जीवाड़े और लापरवाही की परतें अब हर दिन एक नया ‘महाखुलासा’ कर रही हैं।ताजा मामला सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाँचू में कार्यरत सहायक लैब टेक्नीशियन किशन गोपाल छंगाणी से जुड़ा हैजिसने जयपुर निदेशालय से लेकर जिला व राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण तक की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।पूरे घटनाक्रम को देखकर यह साफ हो चुका है कि सरकारी सिस्टम में ‘दस्तावेज सत्यापन’ महज एक खोखली कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है और पीड़ितों को न्याय देने के नाम पर सिर्फ तारीखों का अंतहीन जाल बुना जा रहा है।

जयपुर निदेशालय की घोर लापरवाही 
प्रयोगशाला सहायक भर्ती-2018 से जुड़े दस्तावेजों से सनसनीखेज सच सामने आया है।साल 2019 में जब किशन गोपाल छंगाणी के दस्तावेज जयपुर निदेशालय पहुंचे,तो वहां बैठे उच्च अधिकारियों ने उन पर गौर करने की जहमत तक नहीं उठाई।आंखें मूंदकर बिना किसी गहन जांच और भौतिक सत्यापन के फाइलों को अंधाधुंध आगे सरका दिया गया। शीर्ष पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की यह अनदेखी साफ इशारा करती है कि विभाग में नीचे से लेकर ऊपर तक जवाबदेही पूरी तरह मर चुकी है।

अनुभव प्रमाण पत्र का विरोधाभास और ‘संदेहास्पद’ बोनस अंक
सिविल रिट याचिका संख्या 2851/2022 के दस्तावेजों ने विभाग की दोहरी नीति को बेनकाब कर दिया है:मामला 1 (मनोज कल्ला – आवेदन क्रमांक 2215524): निदेशालय के 31/07/2023 के आदेश की क्रम संख्या 74 के अनुसार, इनके अनुभव प्रमाण पत्र के कॉलम में ‘अनुभव अवधि’ दर्ज ही नहीं है,लेकिन टिप्पणी में ‘बोनस अंक देय’ लिख दिया गया। बिना अवधि तय किए बोनस अंक कैसे दे दिए गए? मामला 2 (किशन गोपाल छंगाणी – आवेदन क्रमांक 2215685): छंगाणी ने RTI के जरिए CMHO बीकानेर द्वारा प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर स्वयं को स्थायी कर्मचारी बताया। उन्हें 04 वर्ष 10 माह 22 दिन का अनुभव प्रमाण पत्र जारी हुआ,जिसे संयुक्त निदेशक बीकानेर द्वारा सत्यापित भी किया गया। निदेशालय की सूची की क्रम संख्या 75 में अवधि तो 04 वर्ष 10 माह दिखाई गई,लेकिन कार्य दिवसों के संशोधन को लेकर छंगाणी को सिस्टम के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया गया।

RTI पर सूचना देने से कतराया निदेशालय
जब छंगाणी ने 04/06/2025 को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम-2005 के तहत सिविल रिट याचिका संख्या 8199 से संबंधित जानकारी चाही,तो जनसूचना अधिकारी ने एक गैर-जिम्मेदाराना और अनौपचारिक टिप्पणी करते हुए सूचना देने से साफ इनकार कर दिया। विभाग ने बहाना बनाया कि मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण सूचना देने से ‘कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित’ हो सकती है।सवाल यह उठता है कि आखिर निदेशालय ऐसा क्या छुपाना चाहता है जो पारदर्शी सूचना देने से भी थर-थर कांप रहा है? जब विभाग ने छंगाणी की गुहार नहीं सुनी, तो उन्होंने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जोधपुर की शरण ली। प्राधिकरण ने 15/04/2024 को पत्र जारी कर पैरवी के लिए पैनल अधिवक्ता भी नियुक्त किया। लेकिन इसके बाद जो हुआ,वह न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तारीख पर तारीख का खेल:

पहली तारीख 13/08/2024 को थी और अब वर्तमान में 21/05/2026 की तारीख बीत जाने के बाद भी नतीजा शून्य है।दस्तावेजों को गायब करने या मेंशन न करने की साजिश: पीड़ित द्वारा लगातार ई-मेल, टोल-फ्री नंबर पर फोन और समाचारों की कतरनें भेजने के बावजूद,आज तक पैनल अधिवक्ता द्वारा कोर्ट में महत्वपूर्ण दस्तावेजों को मेंशन ही नहीं किया गया।पीड़ित का सीधा आरोप है किजिला विधिक प्राधिकरण बीकानेर और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जोधपुर की इस सुस्ती और अनदेखी से ऐसा प्रतीत होता है कि यह न्याय दिलाने की प्रक्रिया नहीं,बल्कि जानबूझकर किसी ‘व्यक्ति विशेष अधिवक्ता’ को फायदा पहुंचाने या मामले को दबाने की एक सोची-समझी अंदरूनी साठगांठ है।जयपुर निदेशालय के जिन उच्च अधिकारियों ने 2019 में बिना जांचे फाइलों को आगे बढ़ाया, उन पर आपराधिक लापरवाही का मुकदमा कब दर्ज होगा?गरीबों और शोषितों को मुफ्त विधिक सहायता देने का दावा करने वाला ‘विधिक सेवा प्राधिकरण’ खुद कटघरे में है;उसके नियुक्त किए गए पैनल अधिवक्ता दस्तावेजों को कोर्ट के पटल पर रखने से क्यों कतरा रहे हैं?क्या राजस्थान सरकार इस पूरे तंत्र की उच्च स्तरीय विजिलेंस जांच कराएगी या फिर लीपापोती का यह गंदा खेल ऐसे ही चलता रहेगा?इस पूरे प्रकरण ने साबित कर दिया है कि राजस्थान के चिकित्सा विभाग और विधिक सहायता तंत्र में सब कुछ ठीक नहीं है।यदि समय रहते इस महाखुलासे पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया गया, तो जनता का सरकारी व्यवस्था और न्याय प्रणाली से विश्वास पूरी तरह उठ जाएगा।