जय नारायण बिस्सा
तहलका न्यूज,बीकानेर।हमें अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था,कश्ती वहां डूबी जहां पानी का बहाव कम था।जी हां किसी शायर की ये पंक्तियां पीबीएम अस्पताल पर सटिक बैठती है।जहां होने वाले विवादों की वजह कही न कही यहां के अधिकारी और उनके निकाले आदेश बनते जा रहे है। जिस कारण पीबीएम अस्पताल प्रदेश ही नहीं पूरे देश में सुर्खियों में है। ऐसा नहीं यहां इलाज में किसी प्रकार की कमी है। बल्कि इस सिस्टम को चलाने वाले ही इसे विवादों में लाने में अहम भूमिका निभा रहे है। जिसके अनेक उदाहरण सामने है। जब हमारे संवाददाता ने इसकी पड़ताल की तो इसके पीछे अनेक कारण सामने आएं।इसमें बड़ा कारण सता के साथ रहने वाले चिकित्सा अधिकारी पर अत्यधिक मेहरबानी है। ऐसे ही एक अधिकारी है डॉ शिवशंकर झंवर।जो कागजों में पीबीएम में अच्छे प्रबंधन के लिये गठित किसी भी समिति के प्रभारी नहीं है।परन्तु उनके पास पीबीएम के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी की क्रय समिति,सेन्ट्रल ड्रग वेयर हाउस,पेट सिटी स्केन के बिलों के हस्ताक्षर के प्रभार है।इनकी निविदाओं में भी पूरा हस्तक्षेप रहता है।हालांकि पीबीएम में अच्छे प्रबंधन के लिये अनेक प्रकार की कमेटियां व समितियों का गठन किया गया है। जिसके प्रभार अलग अलग चिकित्सकों को सौंपे गये है। वाकयदा इसकी सूची भी बनाई गई है। जो समय समय पर सरकार या प्रशासन को मांगने पर उपलब्ध करवा दी जाती है। मजे की बात तो यह है कि इस प्रकार की सूचियां ही पीबीएम को विवादों में घेरे में डाल देती है। क्योंकि मंत्री के निर्देश पर हटाएं गये चिकित्सक को ही अहम समितियों की जिम्मेदारी दे रखी है।
चिकित्सा मंत्री ने पहले भी छीने थे अधिकार
गौर करने वाली बात तो यह है कि जिस डॉ शिवशंकर झंवर को पीबीएम के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी की क्रय समिति,ड्रग वेयर हाउस,पेट सिटी स्केन के बिलों के हस्ताक्षर के प्रभार दिए गये है। इन्हीं डॉ झंवर से चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के निर्देश पर तत्कालीन मेडिकल कॉलेज प्रधानाचार्य डॉ गुंजन सोनी ने ड्रग वेयर हाउस के नोडल अधिकारी सहित अनेक कमेटियांं के अधिकार एक साल पहले छीन लिए थे। बताया जा रहा है कि उस समय डॉ झंवर पर डिमांड नोट पर कांटछांट कर खुद के साइन करने जैसे गंभीर आरोप लगे थे। जिसके लिये उस समय के चिकित्सा शिक्षा सचिव डॉ.अंबरीश कुमार ने एसपी मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल से फैक्चुअल रिपोर्ट भी मांगी थी।
ये है पूरा मामला
पता चला है कि पीबीएम हॉस्पिटल में मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (मां) योजना में फर्जी साइन से करीब 60 लाख कीमत की दवाओं की खरीद की गई। यह खरीद भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले दिनों उपजी युद्धकालीन परिस्थितियों की आड़ में की गई थी।भारत-पाक के बीच युद्धकालीन परिस्थितियों के चलते राज्य सरकार ने राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में बेड और दवाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश जारी किए थे। उसी दौरान मां योजना के तहत राजस्थान मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी को 27 नंबर स्टोर के नाम से 29 प्रकार के सर्जिकल आयटमों की अतिरिक्त डिमांड जारी की गई।सेंटर ड्रग वेयर हाउस इंचार्ज डॉ.शिव शंकर झंवर ने इसके लिए एनएसी(नोट अवेलेबल सर्टिफिकेट)जारी कर दी। इनमें से 24 तरह के आइटम्स की खरीद रेट कांट्रेक्ट पर दो फर्मों से की गई,जिनकी कीमत करीब 60 लाख रुपए गई। मामला उस वक्त उजागर हुआ जब दवाओं की सप्लाई और बिल 27 नंबर स्टोर पहुंचे।योजना के नोडल प्रभारी डॉ. सीताराम महरिया ने डिमांड नोट पर खुद के ही साइन फ र्जी करार देते हुए बिलों पर साइन करने से मना कर दिया और आइटम भी लौटा दिए। उन्होंने 21 मई को बाकायदा लिखित में इसकी शिकायत पीबीएम अधीक्षक डॉ.सुरेंद्र कुमार वर्मा से की थी।
जांच रिपोर्ट में दोषी होने का दावा
25 मई 25 के मामला उजागर होने के बाद पीबीएम अधीक्षक ने इसके लिए मेडिसिन विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ.परमेंद्र सिरोही, सर्जरी डॉ. आरके काजला और सीनियर अकाउंट ऑफिसर अभिषेक गोयल की कमेटी गठित कर दी। यह कमेटी हालांकि 9 दिन बाद भी रिपोर्ट तैयार नहीं कर पाई थी क्योंकि कमेटी के सदस्यों को प्रकरण से संबंधित किसी तरह के दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। लेकिन जब दस्तावेज उपलब्ध करवाएं गये तो कमेटी के समक्ष डॉ झंवर द्वारा फर्जी साइन की बात सही साबित हुई थी। इसके बाद जिला प्रशासन की ओर से भी डॉ देवेन्द्र चौधरी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। परन्तु इस कमेटी ने लीपापोती कर मामले को रफा दफा कर दिया। हालांकि राजनीतिक दबाव के कारण इस प्रकरण को पीबीएम प्रबंधन ने ज्यादा उजागर नहीं किया।
आखिर डॉ झंवर पर इतनी मेहरबानी क्यों
पीबीएम के बिगड़तें हालातों के बीच आमजन में ये चर्चाएं भी जोरों पर है कि जिस चिकित्सक डॉ शिवशंकर झंवर को एक वर्ष पहले सभी समितियों से मंत्री के निर्देश पर हटा दिया गया था। उसी चिकित्सक को फिर इतनी जिम्मेदारियां देना कही न कही पीबीएम प्रबंधन को सवालों के घेरे में खड़ी करती है। जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी विगत दिनों देखने को मिला। जब 6 प्रसूताओं की बिगड़ी तबीयत के लिये तीन गुना अधिक रेट पर इंजेक्शन की खरीद की गई। सूत्रों से यह भी पता चला है कि आरजीएचएस योजना के तहत बिन्नाणी लैब में विशेष जांचों के लिये भेजे गये रोगियों के बिलों के लैब को भुगतान भी इन्हीं के हस्ताक्षर से हुए है और अभी पेट सिटी स्केन के बिलों के हस्ताक्षर भी डॉ झंवर ही करते है।
राजनेताओं की नजदीकियों को बताई जा रही है वजह
उधर जब हमारे संवाददाताओं ने अस्पताल में पता किया तो अनेक जनों ने दबी जुबां में डॉ झंवर की राजनेताओं की नजदीकियों को इसका अहम कारण बताया। उनका कहना था कि जिले के एक मंत्री से इनकी खासी नजदीकी है और वे उनके ही दम पर पीबीएम में अपनी धौस जमाते है। वहीं पिछली सरकार में भी एक मंत्री पर पारवारिक संपर्क का लाभ उठाते रहे है। ऐसे में उनके खिलाफ इतने गंभीर आरोप होने के बाद भी उन्हें पीबीएम में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों दे रखी है। जिसके चलते पीबीएम कभी दवाओं को लेकर तो कभी घोटालों को लेकर विवादों के घेरे में आ रही है।
संलग्न:दो आदेश की कॉपियां। गौर करें। एक हस्ताक्षर युक्त। दूसरी बिना हस्ताक्षर के

