nikay chunav

तहलका न्यूज,बीकानेर।नगर निगम चुनाव का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 80 वार्डों में कौन पार्षद बनेगा।असली राजनीतिक कहानी उसके बाद शुरू होगी। मतदाता वार्ड का प्रतिनिधि चुनेंगे,लेकिन निर्वाचित पार्षदों की संख्या तय करेगी कि नगर निगम की कमान किस राजनीतिक खेमे के हाथ जाएगी।राजस्थान में निकाय चुनाव में पहले पार्षदों का चुनाव होगा और इसके बाद महापौर का निर्वाचन निर्वाचित पार्षद करेंगे।यानी मतदाता सीधे महापौर नहीं चुनेंगे। शहर में 80 वार्ड होने के कारण निर्वाचित सदस्यों के बीच स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा 41 बनता है।यही वजह है कि किसी पार्टी को 40 सीटें मिलने पर भी सत्ता का गणित खत्म नहीं होगा और 1-2 निर्दलीय पार्षद पूरे बोर्ड की दिशा बदल सकते हैं।

आंकड़ा तय करेगा सत्ता की चाबी
चुनाव मैदान में भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशी अपने-अपने वार्ड जीतने की कोशिश करेंगे,लेकिन पार्टी संगठन की नजर सीटों के कुल आंकड़े पर रहेगी।एक पार्टी 38-40 सीटों तक पहुंचती है और दूसरी भी बहुमत से दूर रहती है,तो मुकाबला मतदान खत्म होने के बाद भी जारी रह सकता है।यहीं से व्यक्तिगत रिश्ते,स्थानीय प्रभाव,निर्दलीय पार्षद और राजनीतिक बातचीत महत्वपूर्ण हो जाएंगे।पिछली बार भी ऐसा ही हुआ।

सत्ता का संभावित गणित
– 40 या अधिक सीटें: बहुमत के साथ महापौर चुनाव में स्थिति मजबूत इस बार

– 38-40 सीटें: बहुमत से कम,लेकिन सत्ता बनाने की संभावना कायम

– निर्दलीयों की निर्णायक संख्या: दोनों प्रमुख दलों के लिए बातचीत का दौर

– करीबी आंकड़ा: एक-एक पार्षद की राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है।

आरक्षण ने बदली रणनीति, अब टिकट से आगे महापौर की तैयारी
निगम में महापौर पद को लेकर उपलब्ध आरक्षण सूची में अनारक्षित वर्ग दर्ज है। वार्डों के आरक्षण में अलग-अलग श्रेणियों का वितरण होने से पार्टियों के सामने एक साथ दो स्तरों की रणनीति है—पहले जीतने योग्य उम्मीदवार उतारना और फिर ऐसा बोर्ड बनाना,जिसमें महापौर चुनाव के समय पर्याप्त समर्थन जुट सके।इसका मतलब यह है कि चुनावी टिकट अब केवल वार्ड जीतने का साधन नहीं रहेगा।मजबूत स्थानीय चेहरे को उतारना,संभावित महापौर सम निर्दलीय उम्मीदवारों को अक्सर वार्ड स्तर की चुनौती माना जाता है,लेकिन इस चुनाव में उनका महत्व परिणाम के बाद बढ़ सकता है। यदि दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर रहते हैं,तो निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं।