तहलका न्यूज,बीकानेर।नगर निगम के 80 वार्ड के आरक्षण की लॉटरी ने चुनावी समीकरण बदल दिए हैं। कई महीनों से अपने वार्ड में चुनाव की तैयारी कर रहे दिग्गज नेताओं को झटका लगा है।प्रभावशाली नेताओं के वार्ड महिला या फिर ओबीसी जाति के लिए आरक्षित हो गए हैं।अब उनके चुनाव लडऩे की संभावनाओं पर विराम लग गया है।दूसरी ओर कई नए चेहरों के लिए राजनीति के दरवाजे खुल गए हैं।आरक्षण की सूची सामने आते ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में टिकट को लेकर अंदरूनी हलचल तेज हो गई है।अब कई नेता खुद चुनाव लडऩे के बजाय अपनी पत्नी,पुत्री या परिवार के अन्य सदस्यों को मैदान में उतारने की रणनीति बना रहे हैं।राजनीतिक गलियारों में टिकट की लॉबिंग,नए समीकरण और संभावित बगावत की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं।नगर निगम की लॉटरी में कई चर्चित नेताओं के वार्ड आरक्षित होने से उनकी चुनावी तैयारियों पर ब्रेक लग गया है।इन नेताओं के लिए अब या तो परिवार के किसी सदस्य को चुनाव मैदान में उतारना होगा या फिर संगठन में नई भूमिका निभानी होगी।
आरक्षण की लॉटरी के ये हुआ प्रभाव
परिवारवाद की राजनीति को मिलेगा बढ़ावा: वार्ड आरक्षण के बाद सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि कई प्रभावशाली नेता अब अपनी पत्नी,पुत्री या अन्य महिला परिजन को टिकट दिलाने की कोशिश करेंगे।पिछले चुनावों की तरह इस बार भी कई वार्डों में चुनावी कमान पर्दे के पीछे से वरिष्ठ नेताओं के हाथ में रहने की संभावना है।
भाजपा और कांग्रेस की बढ़ी मुश्किलें-: आरक्षण के बाद दोनों प्रमुख दलों को अब प्रत्येक वार्ड में नए सिरे से उम्मीदवार तलाशने होंगे। जिन वार्डों में पुराने दावेदार बाहर हो गए हैं,वहां कई नए चेहरे टिकट की कतार में खड़े हो गए हैं। इससे टिकट वितरण आसान नहीं रहेगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट वितरण में जरा-सी चूक बगावत का कारण बन सकती है।कई वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना सकते हैं।
महिला नेतृत्व को मिलेगा बड़ा अवसर-: इस बार बड़ी संख्या में वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित होने से नगर निगम में महिला प्रतिनिधित्व पहले की तुलना में अधिक मजबूत होने की संभावना है।हालांकि कई सीटों पर नेताओं के परिजन चुनाव लड़ सकते हैं, लेकिन कई सामाजिक रूप से सक्रिय महिलाओं को भी पहली बार चुनाव लडऩे का अवसर मिलेगा।
बदले जातीय समीकरण,बदलेंगे चुनावी मुद्दे-: ओबीसी और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित वार्डों ने कई क्षेत्रों का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बदल दिया है।अब चुनाव केवल पार्टी के नाम पर नहीं,बल्कि स्थानीय सामाजिक समीकरण,व्यक्तिगत पकड़ और संगठनात्मक ताकत पर भी निर्भर करेगा।
इंटरनल सर्वे के आधार पर तय होगा भाजपा प्रत्याशी
भाजपा फील्ड के इंटरनल सर्वे के आधार पर आगामी पंचायत राज व स्थानीय निकाय चुनाव में प्रत्याशी तय करेगी।सर्वे में दावेदारों की सक्रियता व पार्टी के प्रति वफादारी देखी जाएगी।सरकार की ओर से वार्डों का आरक्षण तय करने के बाद पार्टी के सर्वे को फाइनल किया जाएगा।इसमें यह देखा जाएगा कि संभावित प्रत्याशी संगठन के कार्यक्रमों और अभियानों में कितना सक्रिय रहा है और पार्टी के प्रति उसकी निष्ठा कितनी मजबूत है।स्थानीय समीकरण,दावेदार की क्षेत्र में पकड़,सामाजिक स्वीकार्यता और चुनाव जीतने की क्षमता जैसे पहलुओं पर भी रिपोर्ट तैयार होगी।इसके साथ ही स्थानीय सांसद,विधायक,जिलाध्यक्ष,मंडल अध्यक्ष से फीडबैक लिया जाएगा।इस फीडबैक में विधायक की अनुशंसा को खास महत्व मिलने की संभावना है।हालांकि टिकट का अंतिम फैसला संगठन स्तर पर ही होगा।
