तहलका न्यूज,बीकानेर।आमजन के हितों के लिये हमेशा सोचने वाले महाराजा गंगासिंह के नाम से बनी महाराजा गंगासिंह विवि लगातार विवादों के घेरे में रही है।इसे विवादों में रखने का काम इसी के मुखियाओं द्वारा किया जाता रहा है।जिसका जीता जागता उदाहरण वर्तमान कुलगुरू मनोज दीक्षित भी है।जिन्होंने नियमों से विपरित ऐसे कई निर्णय लिए जो इनके कार्यकाल में हमेशा सुर्खियों में रहे।बात करें अपने चेहतों को लाभ पहुंचाने की या अपने काले कारनामों पर पर्दों डालने की।कुलगुरू मनोज दीक्षित का कार्यकाल विवादों में ही रहा है।बताया जा रहा है कि अपने कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व भी वे एक ऐसा कारनामा करने की तैयारी में है।जो विवि के नियमों को धता बताकर किया जा रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 28 जुलाई को विवि द्वारा डिग्री वितरण का संभावित कार्यक्रम रखा जा रहा है।जिसके लिए शनिवार को एकेडमिक कौसिंल और बोम की स्पेशल बैठक भी हो रही है।ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक में राज्यपाल हरिभाऊ को मानद उपाधि देने की भी योजना है। सूत्र बताते है कि भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता को खुश करने के और राज्यपाल के समक्ष पहुंची इनकी शिकायतों व काले कारनामें को छिपाने के उद्देश्य से को यह मानद उपाधि देना चाहते है।लेकिन कुलगुरू इन सब नियमों के विरूद्ध काम कर रहे है।जानकारी मिली है कि 7 अगस्त को कुलगुरू दीक्षित का कार्यकाल पूरा हो रहा है और नये कुलगुरू के चयन के लिये सर्च कमेटी भी बनाई जा चुकी है।स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.राजेंद्र बाबू दुबे को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।समिति में प्रो.कैलाश डागा,प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी और प्रो.मदन सिंह राठौड़ सदस्य हैं।सचिवालय ने समिति को जल्द बैठक कर कुलपति पद के लिए नामों का पैनल तैयार कर राज्यपाल एवं कुलाधिपति को भेजने के निर्देश दिए हैं।ऐसे में दीक्षित के इस प्रकार के निर्णय कही न कही संदेह पैदा करने वाले है।
क्या कहते है नियम
अगर एमजीएसयू के नियमों की बात करें तो डिग्री वितरण की अधिसूचना कम से कम 45 दिन पहले जारी होनी चाहिए।लेकिन आज दिनांक तक ऐसी सूचना जारी नहीं हो पाई है।वहीं जिन विद्यार्थियों को यह डिग्री दी जानी है,उन्हें भी 15 दिन पहले सूचित किया जाना भी जरूरी है।परन्तु संभावित कार्यक्रम के अनुसार अब महज दस दिन बाकी है। ऐसे में जिन विद्यार्थियों को यह डिग्री मिलनी है। वे अपने गृह जिले में है या नहीं।इसका भी पता नहीं।साथ ही डिग्री छपने के लिये भी निविदा निकाली जानी चाहिए।लेकिन कार्यक्रम से पांच दिन पहले यानि 23 जुलाई को ओपन टेण्डर की तारीख तय की गई है। ऐसे में पांच दिनों में डिग्री कैसे छपेगी।ये सब सवाल कही न कही कुलगुरू दीक्षित की नियत पर सवालिया निशान पैदा करते है।
तीन माह पहले अधिकार हो जाते है खत्म
राज्यपाल के प्रमुख सचिव की ओर से 1 फरवरी 2022 को जारी आदेश में कहा गया था कि किसी कुलपति के कार्यकाल के अंतिम तीन महीनों में नीतिगत निर्णय नहीं लिए जाएंगे।प्रो दीक्षित का कार्यकाल भी सात अगस्त को पूरा होने जा रहा है। इस हिसाब से मई में इन्हें किसी प्रकार का निर्णय लेने का नियमानुसार अधिकार नहीं है।उसके बाद भी कुलगुरू नियमों को धता बताकर यह आयोजन करना चाह रहे है।
विवि के योगदान में सहयोगियों से दूरी,महज अपनी चाहत
मजे की बात तो यह है कि एमजीएसयू के निर्माण में योगदान देने वालों की फेरिहस्त लंबी है। लेकिन उनको मानद उपाधि देने की बजाय आखिर राज्यपाल को कुलगुरू मानद उपाधि की डिग्री क्यों देना चाहते है।इसको लेकर भी कई सवाल उठे रहे है।विपक्ष इसे अपने काले कारनामें छिपाने का कार्य बता रहा है तो सतापक्ष भी इस निर्णय से दबी जुबान में खुश नहीं है।मंजर यह है कि बोम सदस्य और भाजपा के युवा नेता द्वारा लिखित शिकायत के बाद भी पद भी काबिज रहने के बाद भी इस प्रकार की कारशतानी भ्रष्टाचार की ओर इशारा कर रही है।राजस्थानी भाषा के समर्थक एक भाजपाई ने अपना नाम न छापने की शर्ते पर यहां तक कह दिया कि राजस्थानी की पैरवी करने वालों की जगह कुलगुरू एक मराठी को मानद उपाधि देकर क्या विवि में मराठी सेन्टर का निर्माण करने की योजना बना रहे है।कुल मिलाकर सता पक्ष व विपक्ष के विरोध के बाद भी कुलगुरू द्वार इस प्रकार की हरकत विवि को विवादों के घेरे में खड़ा कर रही है।
