तहलका न्यूज,बीकानेर।स्वास्थ्य महकमे में न्याय और नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक ऐसा शर्मनाक खेल उजागर हुआ है,जिसने जांच अधिकारियों की साख पर बट्टा लगा दिया है। सीएमएचओ बीकानेर के आदेश क्रमांक दिनांक 20/08/2024 के तहत गठित तीन सदस्यीय जांच कमेटी अब खुद संदेह के कटघरे में खड़ी है।सबसे बड़ा सवाल कार्यालय खंड मुख्य चिकित्सा अधिकारी (नोखा) के सहायक लेखाधिकारी (ग्रेड-द्वितीय) ओमप्रकाश की कार्यशैली पर उठा है—आखिर किस ‘अदृश्य दबाव’ या ‘निजी लालच’ के तहत उन्होंने कागजी फर्जीवाड़े पर मोहर लगाई?मामले की गंभीरता को देखते हुए परिवादी कृष्ण गोपाल जी ने राजस्थान संपर्क पोर्टल पर परिवाद संख्या ज्4096 दर्ज करवाकर पूरे प्रशासनिक तंत्र में खलबली मचा दी है।

जांच के नाम पर लीपापोती: कागजों के ‘जादूगर’ बने जिम्मेदार!
आरटीआई से मिले आधिकारिक दस्तावेजों ने जांच अधिकारियों की पोल खोलकर रख दी है।कानूनी रूप से जिस अनुबंध में परिवादी को ‘प्रथम पक्षकार’ होना चाहिए था,वहां आंखें मूंदकर कनिष्ठ विशेषज्ञ/प्रभारी,सीएचसी पाँचू के दस्तखत ठोक दिए गए।क्या सहायक लेखाधिकारी इतने नौसिखिए हैं कि उन्हें प्रथम और द्वितीय पक्षकार का अंतर ही समझ नहीं आया?जो जानकारी निकलकर सामने आ रही है,उसके अनुसार 24 जून 2024 को सीएचसी पाँचू के एनआरएचएम लेखाकार शशि कुमार ने परिवादी से गलत जगह हस्ताक्षर करवाकर खुद गवाही ठोक दी।जबकि सरकारी रिकॉर्ड चीख-चीखकर कह रहा है कि वर्ष 2016 में तो शशि कुमार की तैनाती मक्कासर पीएचसी (हनुमानगढ़) में थी!
‘शून्य’ अनुबंध को जबरन थमाई ‘संजीवनी’
जांच रिपोर्ट के बिंदु संख्या-02 में परिवादी किशन गोपाल छंगाणी के अनुबंध का जिक्र तो बड़े चाव से किया गया,लेकिन यह बुनियादी बात जानबूझकर दबा ली गई कि यह अनुबंध पूरी तरह से ‘शून्य’ और गैर-कानूनी है।सबसे ज्यादा कटघरे में खड़ा करने वाला तथ्य यह है कि आरटीआई से प्रमाणित अनुबंध की दो अलग-अलग प्रतियों में से एक पर हस्ताक्षर मौजूद हैं और दूसरी से दस्तखत पूरी तरह नदारद हैं!यह सीधे तौर पर दस्तावेजों की कूटरचना और हेरफेर का पुख्ता सबूत है।ऐसे में सवाल उठ रहे कि क्या सहायक लेखाधिकारी ग्रेड-द्वितीय ओमप्रकाश ने किसी ‘मलाईदार लालच’ में आकर गलत रिपोर्ट तैयार की,या फिर महकमे के बड़े आकाओं के ‘हंटर’ के डर से अपनी कलम को फर्जीवाड़े का गुलाम बनने दिया?

अब ‘कोष एवं लेखा विभाग’ के पाले में गेंद
संपर्क पोर्टल पर दर्ज शिकायत के बाद मामला अतिरिक्त निदेशक,कोष एवं लेखा विभाग (जयपुर) तक अग्रशित कर दिया गया है।पीडि़ता और आमजन की मांग है कि फर्जी और गैर-कानूनी रिपोर्ट तैयार करने वाले सहायक लेखाधिकारी ओमप्रकाश और संबंधित कमेटी पर कड़ी कानूनी व अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।इस पूरे घालमेल की राज्य स्तरीय निष्पक्ष जांच एजेंसी से निष्पक्ष जांच करवाकर दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए।अगर जांच के नाम पर यूं ही लीपापोती चलती रही,तो सरकारी सिस्टम से जनता का भरोसा पूरी तरह उठना तय है!