तहलका न्यूज,बीकानेर।13 अगस्त की दोपहर कई नेताओं के लिए राहत लेकर आएगी तो कई की पांच वर्ष की राजनीतिक तैयारी पर पानी फेर देगी। नगर निगम चुनाव के लिए इसी दिन वार्डों का आरक्षण तय होगा और इसके साथ ही जयपुर की सियासत में सबसे तेज भागदौड़ शुरू हो जाएगी।कारण साफ है कि 15 दिनों में शहर की सरकार तय होगी। इसके लिये सरकार रोड मैप तैयार करने में जुट गई है।निकाय चुनाव की यह तस्वीर सरकार की ओर से हाईकोर्ट में सोमवार को पेश किए गए चुनावी कैलेंडर के बाद सामने आई है और इसने चुनावी तैयारियों को रफ्तार दे दी है।फिलहाल भाजपा,कांग्रेस और निर्दलीय दावेदार अपने-अपने संभावित वार्डों पर नजर टिकाए बैठे हैं,लेकिन अंतिम फैसला 13 अगस्त की लॉटरी ही करेगी। जिस वार्ड का आरक्षण बदल जाएगा,वहां वर्षों से तैयारी कर रहे कई नेताओं को नया वार्ड तलाशना पड़ेगा। दूसरी ओर,जिन वार्डों में आरक्षण अनुकूल रहेगा,वहां टिकट की दावेदारी और भी मजबूत हो जाएगी। वार्ड बदलने से कई बागी भी सामने आ सकते हैं,वहीं स्थानीयता का मुद्दा भी हावी होगा।
एक ही वार्ड तक सीमित नेता को ज्यादा खतरा
सबसे ज्यादा चुनौती उन नेताओं के सामने होगी,जिनकी राजनीति एक वार्ड तक सीमित रही है।यदि उनका वार्ड आरक्षित हो गया या आरक्षण की श्रेणी बदल गई,तो उन्हें पड़ोसी वार्ड में नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाना होगा।यही वजह है कि कई संभावित प्रत्याशी पहले से ही आसपास के वार्डों में सक्रियता बढ़ा चुके हैं,ताकि जरूरत पडऩे पर विकल्प तैयार रहे।
‘सही वार्ड चुनने की लड़ाई
13 से 27 अगस्त के बीच के 15 दिन चुनाव की दिशा तय करेंगे। इसी दौरान वार्ड बदलेंगे, समीकरण बनेंगे,टिकट बंटेंगे।यह भी साफ होगा कि कौन मैदान में रहेगा। प्रचार शुरू होने से पहले ही सबसे बड़ी लड़ाई ‘सही वार्ड चुनने की होगी।आरक्षण घोषित होने के बाद प्रत्येक वार्ड में दावेदारों की संख्या बदल जाएगी।जातीय समीकरण,संगठन की रिपोर्ट,जीत की संभावना और स्थानीय स्वीकार्यता के आधार पर टिकट तय करने होंगे।एक ही पार्टी के दावेदार आमने-सामने होंगे।
कांग्रेस-भाजपा जिलाध्यक्षों की परीक्षा
वर्ष 2018-19 में लॉच हुए शहर कांग्रेस व शहर भाजपा अध्यक्ष के लिये इस चुनाव में चुनौती व परीक्षा होगी।जहां भाजपा में दावेदारों की अधिकता सिरदर्द बन सकती है तो वहीं कांग्रेस की टीम का गठन अब तक न होना परेशानी का सबब हो सकता है।लेकिन पिछले सात आठ वर्षों की राजनीतिक सफर वाले दोनों ही जिलाध्यक्षों के लिये यह निकाय चुनाव किसी कठीन परीक्षा से कम नहीं। बताया जा रहा है कि दोनों ही दलों में अन्दरूनी कलह भी कही न कही निर्दलियों की संख्या में बढ़ोत्तरी कर सकती है।
