तहलका न्यूज,बीकानेर।बीकानेर में अद्भुत कलाकारी के साथ ताजिय़े बनाए जा रहे हैं।इस्लामी साल हिजरी का पहला महीना मुहर्रम होता है और मुहर्रम के महीने की दस तारीख़ को इस्लाम के आखिऱी पैगंबर हजऱत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए ताजिय़े निकाले जाते हैं।इन ताजिय़ों का निर्माण मुहर्रम का चांद नजऱ आते ही शुरू हो जाता है और इन्हें बनाने वाले कलाकार बहुत अक़ीदतमंदी के साथ इस काम में समर्पित रहते हैं। बीकानेर में भी अद्भुत कलाकारी के साथ ताजिय़े बनाए जा रहे हैं।पिछले कई दिनों से कलाकार इसको बनाने में जुटे है,जो 25 जून को निकाले जाएंगे। ताजिय़े बनाने वाले कलाकार पूरी तरह पाक-साफ होकर ये काम करते हैं।ये काम पूरी तरह से नि:शुल्क किया जाता है।यहां तक कि मैटेरियल भी खुद ही लेकर आते हैं।एक ताजिय़ा बनाने में कम से कम 25 से 30 हज़ार रुपयों का खर्च आता है।शहर के अनेक मोहल्लों में ताजिए बनाएं जाते है।सबसे ज्यादा मोहल्ला चूनगरान में ताजियों का निर्माण होता है।इसके बाद धोबी तलाई क्षेत्र में ताजिये बनाए जाते हैं।बड़े ताजिए बनाने के लिए जिला प्रशासन से लाइसेंस दिया जाता है।इसके अलावा उस्ता बारी,तेलिया के मोहल्ले,जोशीवाड़ा क्षेत्र,सर्वोदय बस्ती,धोबी तलाई सहित कई मुस्लिम मोहल्लों में छोटे-छोटे ताजिये भी निकाले जाएंगे।

अनेक प्रकार के बनाएं जाते है ताजिए
ताजिए सोने-चांदी की कलम की नक्काशी सहित मेहंदी,कांच,सरसों,लकड़ी और कागज की चादर से बनाए जाते हैं।दो दिनों तक मुस्लिम समुदाय के लोग मुहर्रम का त्योहार मनाएंगे इसके बाद ताजियों को कर्बला में ठंडा किया जाता है। बीकानेर की उस्ता कला से लेकर बेजोड़ कारीगरी के नमूने इन ताजियों के निर्माण में इस्तेमाल किए जाते हैं,जो अपने आप में विख्यात हैं।

कई ताजिये अपने मुकाम स्थल पर ही होंगे ठंडे
शहर में मिट्टी के ताजिये,उस्तों के ताजिये सहित करीब तीन ऐसे ताजिये हैं जो अपने मुकाम स्थल पर ही ठंडे किए जाते हैं।डूडी सिपाहियान में तैयार होने वाले मिट्टी के ताजिये को उसी स्थान पर ठंडा किया जाएगा। जहां पर वह तैयार होता है।वहीं उस्ता बारी में उस्तों के ताजिये को भी मोहल्ले में ही ठंडा किया जाता है।

हिंदू मुस्लिम भाईचारा का प्रतीक
मोहर्रम के त्योहार पर हिंदू मुस्लिम भाईचारा का प्रतीक भी है।यहां मोहर्रम पर मुस्लिम समाज के लोग तो ताजिया को देखकर मन्नत मांगते है तो वहीं,हिंदू समाज के लोग भी ताजिया को देखने आते हैं और मन्नत मांगते है और पतासे,बिस्कुट आदि का प्रसाद चढ़ाते है। ऐसी मान्यता है कि ताजिए के नीचे से निकलने पर मनोकामना पूरी होती है। 26 जून को मातमी माहौल में बड़ी कर्बला में ताजिए ठंडे किये जाएंगे।