तहलका न्यूज,बीकानेर।​राष्ट्रीय महिला संगठनों ने आगामी संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन को जल्दबाज़ी में और बिना पर्याप्त लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पारित करने के प्रस्तावित कदम का कड़ा विरोध किया है।अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की राज्य महासचिव डॉक्टर सीमा जैन की ओर से जारी इस वक्तव्य में स्पष्ट किया गया है कि इतने दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक को महिला संगठनों,राजनीतिक दलों और नागरिक समाज समूहों सहित सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श के बिना पारित नहीं किया जाना चाहिए।जैन ने कहा,”महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग 30 वर्षों से अधिक लंबे सतत संघर्ष का परिणाम है।हम महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के साथ किसी भी प्रकार की शर्त जोड़ने को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं।न्याय में देरी करने वाली शर्तों के माध्यम से इस अधिकार को और अधिक टाला नहीं जा सकता।”सितम्बर 2025 में बिहार विधानसभा चुनावों से पहले भी सरकार ने इसी तरह की जल्दबाज़ी दिखाई थी।वर्तमान में जारी चुनावी प्रक्रियाओं के बीच इस महत्वपूर्ण विधेयक को लाना लोकतांत्रिक मानदंडों के खिलाफ है।​हमारी मांग है कि 2023 के विधेयक में से जनगणना और परिसीमन की अनिवार्य शर्तों को तुरंत हटाया जाए।महिला आरक्षण को किसी अनिश्चित भविष्य की जनगणना से जोड़ना अनिश्चितकालीन देरी की रणनीति है।महिला आरक्षण के भीतर SC/ST आरक्षण सुनिश्चित किया जाए और OBC महिलाओं के आरक्षण के प्रश्न को गंभीरता से शामिल किया जाए।​बिना स्पष्टता के सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव महिलाओं के वास्तविक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के बजाय उसे टालने का एक माध्यम है,जो सत्ताधारी दलों की पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाता है।बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विधेयक पारित करने के प्रयास को वापस लिया जाए और सभी हितधारकों के साथ उचित परामर्श किया जाए।डॉ.जैन ने गीता मुखर्जी जैसी महान नेताओं के संघर्ष को याद दिलाते हुए कहा कि इस ऐतिहासिक आंदोलन को चुनावी लाभ के औज़ार के रूप में इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा।जिन महिला संगठनों ने इस संघर्ष का नेतृत्व किया है,वे मोदी सरकार द्वारा इसे इस प्रकार हड़पने के हर प्रयास का पुरज़ोर विरोध करेंगी।महिलाओं का सशक्तिकरण केवल प्रतीकात्मक नहीं होना चाहिए। इसे ईमानदार,पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई के माध्यम से वास्तविकता में बदला जाना चाहिए।